Sunday, December 5, 2010


डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह का नाम यदि आप कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में लेंगे तो आपको बहुत ही सम्मान के साथ देखा जायेगा परन्तु विडंबना देखिये भारत में इनके नाम से बहुत ही कम लोग परिचित हैं डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह किसी समय में भारत में रामानुज की कोटि के गणितज्ञ बनकर उभरे थे।
बिहार के भोजपुर जिला स्थित बसंतपुर गाँव में एक सिपाही के परिवार में 2 अप्रैल 1944 को जन्मे इस गणितज्ञ ने छोटी सी उम्र मे ही अपनी प्रतिभा के बलबूते सभी को हैरान कर दिया था सन् 1962 में नेतरहाच स्कूल से दसवीं की परीक्षा में राज्यस्तर पर प्रथम स्थान मिला इसके बाद इन्होंने पटना साइंस काँलेज में इंटरमीडियेट की के लिये प्रवेश लिया यहीं पर इनकी गणित की विलक्ष्ण प्रतिभा को देख काँलेज के प्रोफेसर चकित रह गये और पटना विश्वविद्यालय की नियमावली में संशोधन कर इन्हें समय से पूर्व ही स्नातक की उपाधी दे दी गयी । इनसे प्रभावित होकर अमेरिका की बर्कले यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर केली 1963 भारत आये और छात्रवृति पर उन्हें  बर्कली के कैललिफोर्निया विश्वविध्यालय ले गये जहाँ इनकी प्रतिभा के कारण इन्हे जीनियसों का जीनियस के नाम से संबोधित किया जाने लगा। 1969 मे उन्होने कैलीफोर्निया विश्वविघालय मे पी.एच.डी. प्राप्त की। साइकिल वेक्टर स्पेश थ्योरी(Cycle Vector Space Theory) पर किये गए उनके शोध कार्य ने उन्हे भारत और विश्व मे प्रसिद्ध कर दिया।और वहीं से इन्हे डी.लिट की उपाधि घणित के क्षेत्र में किये गये अनुसंधान के कारण मिली। अपनी पढाई खत्म करने के बाद कुछ समय के लिए वे कुछ समय के लिए भारत आए, मगर जल्द ही वे अमेरिका वापस चले गए। अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी आफ वाशिंगटन में सितंबर 1969 से जून 1971 तक 1165 डालर की रिसर्च एंड टीचिंग की नौकरी परन्तु देश सेवा के ज़ज्बे कारण वह नौकरी छोडकर आ गये और कानपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी में मात्र 800 रुपये पर वर्ष 1971 से 1972 तक रिसर्च एंड टीचिंग का कार्य किया। इसके बाद वर्ष 1972 में ही वे सांख्यिकी संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी, कोलकाता में नौकरी पर चले गए। अमेरिका में उस समय यह वेतन बहुत अच्छा माना जाता था परन्तु भारत में इतने कम वेतन के कारण उनकी पत्नी से अनबन होने लगी और तलाक भी हो गया। यही वह समय था जब उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। सिजो फ्रेनिया रोग की वजह से विक्षिप्त होने पर उनका इलाज डेविड अस्पताल व राजकीय मानसिक आरोग्यशाला, रांची में कराया गया। इसके बाद वे गांव लौट आए। उन्हे 5 अगस्त 1989 को रांची के एक चिकित्सक से दिखा कर उनके भाई ट्रेन से किर्की (पुणे) ले जा रहे थे। रास्ते में खंडवा स्टेशन पर 9 अगस्त 1989 को वे उतर गए और भीड़ में कहीं खो गए। करीब पांच वर्ष तक गुमनाम रहने के बाद उनके गांव के लोगों ने उन्हे छपरा में पाया तो वे गांव लाए गए। इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी सुध ली। उन्हे विमहांस बेंगलूर इलाज के लिए भेजा गया। जहां मार्च 1993 से जून 1997 तक इलाज चला। इसके बाद से वे गांव में ही रह रहे थे। तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री शत्रुध्न सिन्हा ने इस बीच उनकी सुध ली थी । स्थिति ठीक नहीं होने पर उन्हे 4 सितंबर 2002 को मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। उस दौरान करीब एक साल दो महीने तक उनका यहां इलाज चला था। स्वास्थ्य में लाभ देखते हुए उन्हें यहां से छुट्टी दे दी गई थी।  उनके भतीजे राकेश का कहना है कि पहले जब उन्हें दिल्ली लाया गया था तब भी वे उनके साथ थे, वर्ष 2003 से अब तक वे गांव में ही रहे। छात्रों को उन्होंने पढ़ाया भी लेकिन एकाएक चिड़चिड़ापन आने से उनका व्यवहार बदल गया। .एक बार फिर से बिहार सरकार ने विश्वविख्यात गणितज्ञ के इलाज के लिए पहल की है.विधान परिषद की आश्वासन समिति ने 12 फरवरी ,2009 को पटना में हुई अपनी बैठक में डॉ. सिंह को इलाज के लिए दिल्ली भेजने का निर्णय लिया. समिति के फैसले के आलोक में भोजपुर जिला प्रशासन ने उन्हें रविवार दिनांक 12 अप्रैल ,09 को दिल्ली भेजा.उनके साथ दो डॉक्टर भी भेजे गये हैं. दिल्ली के मेंटल अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों की परामर्श पर उन्हें आगे के खर्च का बंदोबस्त किया जाएगा. स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि दिल्ली में परामर्श के बाद यदि जरूरत पड़ी तो उन्हें विदेश भी ले जाया जा सकता है.अभी वे अपने गाँव बसंतपुर मे उपेक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे. पिछले दिनों आरा में उनकी आंखों में मोतियाबिन्द का सफल ऑपरेशन हुआ था।

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